Wednesday, April 29, 2009

अलसाई चिपचिपाती शाम आई थी

फ़िर चली गई जाते हुए,देते

इक हल्कापन सा

कुछ कुछ-नही-सा

Tuesday, April 07, 2009

कभी देखा है नदी को तब , जब
गिर के पहाड़ से आगे निकल जा चुकी होती है ,जब
दरिया भी कही बहुत पास नज़र नही आता होता .
खुश होती है ,अलसाई सी
हंसती है सूरज -हँसी खिलखिलाती