हर सोंच बढ़ रही है हर रोज़ इक नई सोच बन कर ।
जाने क्यों मुझ पर ही ये साया है ।
लगता है की आगे काफ़ी बढ़ गया हूँ मैं कभी
और कभी पीछे छूट गया हूँ ऐसा लगता है ।
और फ़िर उठते हैं सवाल की
अगर आगे बढ़ गया हूँ तो क्या अब ठहरना होगा ?
या पीछे हूँ तो लगानी होगी दौड़ ?
बस यूँ ही हर जवाब इक सवाल बन जाता है
और हर सवाल अपने को अनाथ पाता है ।
Monday, September 29, 2008
Sunday, September 14, 2008
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